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भारत में बन रहे फोन अब दुनिया में छा रहे हैं, लेकिन असली कहानी ₹2.59 लाख करोड़ से आगे है

भारत कभी मोबाइल फोन के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर था। आज तस्वीर तेजी से बदल चुकी है—देश में बने स्मार्टफोन अब सिर्फ भारतीय ग्राहकों की जरूरत पूरी नहीं कर रहे, बल्कि दुनिया के बाजारों तक पहुंच रहे हैं।

सरकार की ओर से संसद में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत से मोबाइल फोन का निर्यात 2014-15 के करीब ₹1,500 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में लगभग ₹2.59 लाख करोड़ हो गया है। यानी करीब 11 वर्षों में निर्यात में 165 गुना की छलांग लगी है। इसी अवधि में घरेलू मोबाइल फोन उत्पादन भी करीब ₹18,000 करोड़ से बढ़कर ₹6.27 लाख करोड़ पहुंच गया।

लेकिन इन आंकड़ों को सिर्फ एक बड़ी संख्या के तौर पर देखना इस बदलाव की असली अहमियत को समझने से चूकना होगा।

भारत की मोबाइल कहानी में सबसे बड़ा बदलाव क्या आया?

एक दशक पहले भारत का मोबाइल बाजार मुख्य रूप से विदेशी कंपनियों और आयातित उपकरणों पर निर्भर था। अब देश दुनिया के प्रमुख मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग बेस में शामिल हो चुका है।

सरकार के अनुसार, 2014 में भारत में सिर्फ दो मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट थीं। 2025 तक यह संख्या 300 से अधिक हो गई थी और देश में बिकने वाले 99% से ज्यादा मोबाइल फोन स्थानीय स्तर पर बनाए जा रहे थे।

इस बदलाव में Make in India, Production Linked Incentive (PLI) Scheme और वैश्विक कंपनियों द्वारा भारत में उत्पादन बढ़ाने की रणनीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है।

भारत में फोन बनना और फोन के हर महत्वपूर्ण हिस्से का भारत में बनना एक ही बात नहीं है।

यही अगली बड़ी चुनौती है।

Apple और Samsung जैसे ब्रांडों ने बदली तस्वीर

भारत की स्मार्टफोन एक्सपोर्ट कहानी में वैश्विक कंपनियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है।

विशेष रूप से Apple के iPhone उत्पादन में भारत की भूमिका लगातार बढ़ी है। इसके अलावा Samsung और दूसरे बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं ने भी भारत में बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता विकसित की है।

वैश्विक कंपनियों के लिए भारत अब सिर्फ एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं है। यह global electronics supply chain का हिस्सा बनता जा रहा है।

यह बदलाव भू-राजनीति से भी जुड़ा है।

चीन पर उत्पादन निर्भरता कम करने की कोशिश, अमेरिका-चीन व्यापार तनाव और कंपनियों की China+1 strategy ने भारत और वियतनाम जैसे देशों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। Apple के भारतीय उत्पादन और अमेरिका को होने वाले iPhone निर्यात में तेज वृद्धि इसका एक स्पष्ट उदाहरण है।

₹2.59 लाख करोड़ का निर्यात रोजगार के लिए भी बड़ी खबर

मोबाइल फोन की फैक्ट्री सिर्फ फोन असेंबल करने वाले कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहती।

इसके साथ सप्लाई चेन में लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग, टेस्टिंग, कंपोनेंट्स, वेयरहाउसिंग, मशीनरी, सर्विसिंग और अन्य औद्योगिक गतिविधियां भी बढ़ती हैं।

यानी मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार भारत के लिए manufacturing jobs और ancillary industries पैदा करने की क्षमता रखता है।

यही वह हिस्सा है जो लंबे समय में सिर्फ निर्यात के आंकड़े से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

अगली लड़ाई फोन की नहीं, चिप और कंपोनेंट्स की है

भारत ने मोबाइल असेंबली में बड़ा कदम जरूर उठाया है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में वास्तविक गहराई हासिल करने के लिए अगला लक्ष्य semiconductors, memory chips, displays, camera modules और दूसरे critical components का स्थानीय उत्पादन बढ़ाना होगा।

सरकार के अनुसार, भारत का कुल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014-15 के लगभग ₹1.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹13.11 लाख करोड़ हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात भी इसी दौरान लगभग ₹38,000 करोड़ से बढ़कर ₹4.24 लाख करोड़ पहुंचा।

यानी मोबाइल फोन इस बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स कहानी का सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा हैं।

Semiconductor पर अगली बड़ी बाजी

मोबाइल फोन बनाने के लिए सिर्फ असेंबली लाइन पर्याप्त नहीं है। आधुनिक स्मार्टफोन के पीछे अत्यंत जटिल semiconductor ecosystem होता है।

इसी दिशा में Semicon India Programme के तहत semiconductor fabrication, packaging और chip design क्षमताओं को बढ़ाने पर काम किया जा रहा है।

सरकार के अनुसार, भारत में अब Micron और Sahasra जैसी कंपनियां memory-related manufacturing कर रही हैं। इसके अलावा Semicon 2.0 को भी semiconductor ecosystem को और मजबूत करने के लिए मंजूरी दी गई है।

अगर यह ecosystem सफल होता है, तो भारत की भूमिका केवल “फोन जोड़ने वाले देश” की नहीं रहेगी, बल्कि धीरे-धीरे electronics value chain के अधिक हिस्सों में बढ़ सकती है।

क्या भारत चीन की जगह ले सकता है?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

चीन के पास दशकों में विकसित हुआ विशाल electronics ecosystem है, जिसमें component suppliers, semiconductor infrastructure, logistics networks और manufacturing expertise का बड़ा नेटवर्क शामिल है।

भारत ने असेंबली और निर्यात में तेज प्रगति की है, लेकिन अगली चुनौती value addition बढ़ाने की है।

दूसरे शब्दों में, सवाल अब यह नहीं होना चाहिए कि:

“फोन भारत में बन रहा है या नहीं?”

बल्कि सवाल होना चाहिए:

“फोन की कुल कीमत में भारत कितना मूल्य जोड़ रहा है?”

यही अंतर भारत को एक बड़े assembly hub से एक वास्तविक global electronics manufacturing powerhouse में बदल सकता है।

अमेरिका बना बड़ा बाजार, लेकिन जोखिम भी मौजूद

भारतीय स्मार्टफोन निर्यात में अमेरिका की भूमिका तेजी से बढ़ी है। FY24 में अमेरिका भारतीय स्मार्टफोन का सबसे बड़ा निर्यात बाजार था और वहां भेजे गए फोन की कीमत करीब $5.6 अरब रही थी।

यह अवसर बड़ा है, लेकिन किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भी पैदा कर सकती है।

टैरिफ, व्यापार समझौते, मुद्रा विनिमय दर और भू-राजनीतिक बदलाव अचानक निर्यात की लागत और प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए भारत के लिए अगला कदम सिर्फ अमेरिका को अधिक फोन बेचना नहीं, बल्कि यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे बाजारों में भी अपनी उपस्थिति मजबूत करना होना चाहिए।

भारत के लिए अगला लक्ष्य क्या होना चाहिए?

मोबाइल निर्यात में 165 गुना वृद्धि निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसे अंतिम मंजिल मानना गलती होगी।

भारत को अब पांच मोर्चों पर तेजी से आगे बढ़ना होगा:

  • स्थानीय कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना
  • Semiconductor और chip design क्षमता विकसित करना
  • उच्च-मूल्य वाले इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन बढ़ाना
  • भारतीय कंपनियों को global brands की supply chain में ऊपर ले जाना
  • ज्यादा देशों के साथ मजबूत export markets बनाना

अगर ये कदम सफल होते हैं, तो स्मार्टफोन भारत के लिए केवल एक निर्यात उत्पाद नहीं रहेंगे। वे भारत की नई manufacturing economy का प्रवेश द्वार बन सकते हैं।

₹1,500 करोड़ से ₹2.59 लाख करोड़: असली कहानी अभी बाकी है

2014-15 में लगभग ₹1,500 करोड़ का मोबाइल निर्यात और 2025-26 में ₹2.59 लाख करोड़—इन दोनों आंकड़ों के बीच सिर्फ 165 गुना वृद्धि नहीं छिपी है।

इसके पीछे भारत के manufacturing landscape में आया एक बड़ा बदलाव है।

देश अब केवल दुनिया के सबसे बड़े smartphone markets में से एक नहीं है। वह धीरे-धीरे उन देशों की सूची में शामिल हो रहा है जिन्हें वैश्विक कंपनियां उत्पादन और निर्यात के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानती हैं।

अब अगली परीक्षा यह होगी कि भारत इस momentum को कितनी दूर तक ले जा सकता है।

क्योंकि असली लक्ष्य सिर्फ “Made in India” फोन को दुनिया तक पहुंचाना नहीं है—असली लक्ष्य है कि दुनिया के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की अगली सप्लाई चेन में भारत की भूमिका और बड़ी हो।

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